जो डर गया, वो बोर हो गया

मदिरा के खतरों से चिंतित क्यों सिर्फ चाय पीने वाले हैं?
धुम्रपान से परेशान क्यों खुली हवा खाने वाले हैं?
शराबी को तो ज़िन्दगी की चिंता नहीं तो गुर्दा क्या हैं?
बीडी के नशे में मदमस्त को फेफड़ा क्या है?

दिल टूटने का डर सिर्फ कुंवारों को क्यूँ हैं?
ज़िन्दगी छूटने का डर रुक-रुक के जीने वालों को क्यों हैं?
जिसने कुछ पाया ही नहीं वो क्या खोएगा?
जो सपने नहीं देखता वो चैन से सोके भी क्या बोएगा ?

जीने का जूनून तो सब में हैं,
ख़ुशी की चाह हर इंसान के दिल में,
लेकिन पैरों में हैं बेढियां और हथकड़ी हातों में,
हरकतों में जोश कहाँ ? वो तो रह गया बातों में |

ये ज़ंजीर भी खुद की निर्मित,
यह सीमाएं भी खुद से निर्धारित,
जो तुम कर नहीं रहे वो शायद चाहते नहीं करना,
पीछे देखो, कौन रोके हैं? तुम्ही चाहते नहीं बढ़ना |

इतना भी ना डरों की जी ना सको,
ज़िन्दगी को महसूस करने से पहले ही उसे सह ना सको,
अपने विचारो को शब्दों में कह ना सको,
और बिना संसार में गलतियां निकाले रह ना सको |

किसका सपना होता है घर से दूर रहने का,
रोज़ थोड़े थोड़े मरने का?
कुर्सी पे जीवन बिताने का,
और आने वाले पल को छोड़ बीतों पर खुशी जताने का?

आज जतन अकेले के लिए,
कल साथी मिल जायेगा,
एक की जगह चूल्हे पे दो का खाना सिक जायेगा,
ख़ुश रहना पहले ही मुश्किल था अब दुगना कठिन हो जायेगा |

शायद सच तो यही है कि ऐसा ही होता हैं,
जीवन हर इंसान का युहीं कटता है,
वो तो लोग हैं अनोखे जो खुश रहना सीख जाते है,
कम में भी जो ज्यादा पाते हैं |

खुश रेहना भी तो कला हैं,
जिस तेल में हम तल रहे हैं उसमे हर कोई तला है,
वो तो कुछ हैं जो  फल – फूलके ऊपर तेर आते हैं,
और कुछ जल के राख हो जाते हैं |

साल धरती पर हो पच्चीस या हो पच्चास,
जब तक हो दिल में खुश रहने की आस,
बस सहने की नहीं पर सवारने की प्यास,
तब तक धरती पर असफल नहीं तेरा मेरा वास |

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