ज़िन्दगी का इंतज़ार

13760044725_a47ea0efc8_oऐ ज़िन्दगी तेरे इंतज़ार में बैठा हूँ,

 

जब पैदा हुआ, ऑंखें खुली, साँस लेना भी सीखना पड़ा,
धीरे – धीरे बड़ा हुआ, हलके – हलके कदम बढ़ा |
चलने लगा, तो दौड़ने का इंतज़ार,
दौड़े तो फिर उड़ने का ऐतबार ?

 

जब कंठ से निकला पहला स्वर,
तो गीत सुनने के लिए दुनिया बेसबर |
जब पहला अक्षर देख ऑंखें बड़ी हुई,
तो वाक्यों को समझने की हड़बड़ी हुई |
गणना सीखी नहीं थी पूरी,
लेकिन गिनने लगे, तारों से दुरी |
प्रान्तों से परिचय हुआ तो देशों को पुकारने लगे,
देशो से मिले, तो गृहों को निहारने लगे |

 

ऐ ज़िन्दगी तेरे इंतज़ार में बैठा हूँ,

 

पाठशाला की बातें जब धीरे – धीरे पल्ले पड़ी,
तो विश्वविद्यालय की मुसीबत आ गले पड़ी |
विज्ञान की समझ को हम मोहब्बत ही समझ बैठे,
और लाखों औरों की तरह, इंजीनियरिंग में दाखिला लेने की भूल कर बैठे |
फिर क्या, परमाणु ऊर्जा से ले गृहत्व आकर्षण,
से जून्झने में निकलने लगा ज़िन्दगी का हर एक क्षण |
पता नहीं इस अभ्यास का कर्तव्य हमें क्यों निभाना था ?
जब ज़िन्दगी तेरे इंतज़ार में आँखों को स्क्रीन के सामने ही सुखाने था |

खैर इस दौर में मौज मस्ती और यारी का आभास हुआ,
कुछ पल के लिए शायद तेरी मौजूदगी का एहसास हुआ |
लेकिन तू कंबख्त दूर से ही मुस्कुरा के निकली,
जैसे सुखी धरती को बादल सिर्फ दिखाते बिजली |

तू निकली तो कहाँ फिर आयेगी ?
कब तक यूँ इंतज़ार कराएगी ?
ऐ ज़िन्दगी तेरे इंतज़ार में बेठा हूँ !

 

जब शिक्षा ख़त्म कर हमने कर्म को अपनाया,
तो काम सीखने को नहीं, करने को बेबस खुदको पाया,
छोटी चीजों में आनंद कहाँ ? बड़े ज़िम्मे थे तलाशने,
लोहा नहीं था मोड़ना, हमे तो हीरे थे तराशने |

 

जिस उत्साह से थामा था नौकरी का हाथ,
उसी जज़्बे से फिर ढूंड रहे थे शिक्षा का साथ,
विद्या मंदिर में फिर शायद तेरे दर्शन होंगे,
गिनती के ही हों फिर भी क्या हसीं वो क्षण होंगे |

 

ऐ ज़िन्दगी तेरे इंतज़ार में बैठा हूँ |

 

और पढ़े और बढे, फिर भी तू न आई,
परेशां हो दौलत में धुंडने लगे तेरी परछाई |
ना धन में, ना दौलत में,
ना नशे में, ना औरत में,
कैसी है रे तू ज़िन्दगी, तू मौजूद तो है लेकिन फिर भी पास नहीं,
जिंदा तो कहते है लोग मुझे, लेकिन फिर भी तेरा मुझमे वास नहीं ?

 

ऐ ज़िन्दगी तेरे इंतज़ार में बैठा था |

 

फिर एक दिन अचानक जैसे आँखों पे से उठी काई हो,
जैसे मन की किरणों ने खींची तेरी धरती पर परछाई हो,
नसों में ऐसा खून बहा, फेफड़ों में वो साँसें,
जैसे आखिर कार वो पेय मिला, जिसके थे अरसों से प्यासे |

 

इन हाथों में ही थे तेरे बीझ, उन्हें मैंने बोया ना था,
तुझे फिज़ूल में ही ढूंड रहा था, तुझे तो खोया ही न था |

 

अपनी पसंद पे बुलंद रहना,
हमेशा मन की ही कहना,
वो हे ज़िन्दगी |
जिसका सालों तक प्रीमियम न भरना पड़े,
जिसके इंतज़ार में रोज़ – रोज़ ना मरना पड़े,
वो है ज़िन्दगी |
किसी और को न मिली उसकी, तो उससे ना डरना पड़े,
और जिसे मिल गयी उससे ना जलना पड़े,
वो है ज़िन्दगी |

 

अपनी गलतियों से सींचो, और अनुभव का खाद दो,
पेड़ ज़िन्दगी का उगाओ, फिर फलों का स्वाद लो |
ज़िन्दगी मंजिल नहीं है, सफ़र है, सुना है पर भूल सब जाते हैं,
इसलिए शायद जीवन के अंत पर, ना जीने पर अबसोस जताते हैं |

 

तो फिर क्या बैठोगे अब ज़िन्दगी के इंतज़ार में ?
ये पड़ोगे, जीवन के प्यार में ?

This poem was written while waiting for a flight at the Hyderabad Airport
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