आज कुछ सरकारी करते हैं

बैंठे हैं यहाँ सोचते हुए,
नाक को हलके से खरोचते हुए,
अरमानो को दातों में दबोचते हुए,
और कल को आज से पोछते हुए |

कुछ करने की चाह नहीं,
चलने को दिखती राह नहीं,
पता नहीं क्या गलत क्या सही,
ऐसे भी बीते कभी माह नहीं |

मेज़ पर रख कर पैरों को,
गालियाँ देकर गैरों को,
झपकियाँ लेकर दोपहरों को,
और लूट के मोहोल्लों शहरों को,

कट चाय में आज चमच खड़ा करते है,
आज कुछ सरकारी करते है |

ठेले से भाजी उठाके खाना है,
दुकानदारों को भी तो डराना है,
सिग्नल पे वाहनचालकों को सताना है,
और लगाना ट्रक वालों को जुरमाना है,

बुलडोज़र लेकर दुकाने तोड़े?
शान से फिर कतारे तोड़े?
ट्रैफिक में बत्ती जला सिग्नल तोड़े,
और फिर रेड के नाम पर ताले तोड़े?

इस जनता के दिल में हमारे लिए डर भरते है,
आज कुछ सरकारी करते है |

गरीब से रोटी छीन, अमीर को चढ़ाना है,
देश में धर्मो का खौफ फैलाना हैं,
जिस जनता ने चुना हमे उसे बेबस बनाना हैं,
और पुश्ते खा सके इतना कमाना हैं,

मंच पे चढ़कर भाषण सुनाना हैं,
सदभावना की आड़ में सच को छिपाना हैं,
राष्ट्रीय स्तर पे अरबों चबाना हैं,
और फिर गल्ली नुक्कड़ में पुतला लगवाना है,

आज धर्म देश भुला अपनी जेबे भरते हैं,
आज कुछ सरकारी करते हैं |

सड़क पर खड़े प्रदुषण का आहार लेते है,
कुछ हज़ार में परिवार भी चलाते है,
हर व्यक्ति से घृणा भी पाते है,
और कर्म करने पे ‘पहुँच’ वाले को आत्मसम्मान का बलिदान चढाते हैं,

अपने बच्चों को मन चाहा शिक्षण ना दे सके,
गाँव में बिना बिजली पानी के भी रुके,
हफ्ते जंगलों में दौरा करके भी ना थके,
और बड़े से बड़े नेता के सामने ना झुके,

देश के बदलाव को जीवन बनाए,
बिना आभार की अपेक्षा लगाए,
घर परिवार की निंदा खाए,
और निजी क्षेत्र की तन्खाओ से बिना ईर्षा जगाए,

कुछ लोग हर दिन निःस्वार्थ काम भी करते है,
शुक्र है की चन लोग, रोज़ कुछ सरकारी करते हैं |

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